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नागपुर के पुराने हिस्से

 

Tushar

मार्च के दिन अचानक नागपुर के पुराने हिस्से महाल में दंगे भड़क उठे। यह आम लोगों के लिए

अप्रत्याशित ज़रूर था। शहर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में भड़की हिंसा ने आम लोगों के लिए

रोज़मर्रा के जीवन को उलट पलट कर रख दिया था। हिंसक घटनाओं में एक मुस्लिम 17 वर्षीय

किशोर रज़ा युसुफ खान, जो दूध लेने निकाला था और एक 38/40 वर्ष के वेल्डर इरफान अंसारी बुरी

तरह घायल हुए। इरफान काम के सिलसिले में इटारसी जाने के लिए घर से जब निकाला तो उसे

बलवे की खबर नहीं थी। सेंट्रल एवेन्यू तक आने के बाद ऑटो रिक्शा वाले ने उसे यह कह कर बीच

राह में उतार दिया की बलवा हो रहा है, अब और आगे नहीं जाएगा। इतने में हमलावरों ने उसे

अकेला पा कर निशाना बनाया। पुलिस ने उसे सरकारी इन्दिरा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल

में “दुर्घटना में घायल” बता कर भर्ती किया! डीसीपी रैंक के कुल दो अधिकारी भी पथराव में घायल

हुए। पाँच दिन अस्पताल में मौत से लड़ने के बाद इरफान अंसारी ने इंदिरागांधी मेडिकल कॉलेज

अस्पताल (मेयो) में आखिरी सांस ली। पुलिस के आपसी तालमेल के अभाव और लचर तैयारी के

किस्सों से अगली सुबह के अखबार रंगे थे। घायल DCP और अन्य पुलिस कर्मियों के चित्र भी छापे

थे। आगजनी, दुकानों की लूट, वाहनों को जालना, पथराव और आँसू गैस से मध्य और पूर्व नागपुर

के कतिपय इलाके हलाकान थे।

शहर के ग्यारह पुलिस थाना क्षेत्रों में छः दिनों तक करफ़्यू लगा रहा। जन-जीवन ठप्प रहने से

लाखों मेहनती लोगों को कामकाज से दूर रहने और भूखे प्यासे रहने की नौबत आई। आगजनी की

घटनाओं में भारी नुकसान के अलावा शहर के कारोबारी इलाके में कर्फ़्यू की वजह से हर दिन लगभग

250 से 300 करोड़ का कारोबारी नुकसान हुआ। खबरों के मुताबिक घायलों में दस कमांडो, दो IPS

अधिकारी और दो दमकल कर्मी भी शामिल थे। पुलिसकर्मी और दमकल कर्मचारी अधिकतर हिंसा के

केंद्र में रहे हंसपुरी इलाके में घायल हुए।

अपनी प्रकृतिक मृत्यु के 318 साल बाद आलमगीर औरंगजेब जब फिर से लौटा तो उसे यह मंज़र

देख कर हैरानी ज़रूर हुई होगी! अपनी 49 साला हुकूमत में से प्रदीर्घ पचीस बरस औरंगज़ेब ने

लड़ाइयाँ लड़ने में खर्च किए थे। लेकिन उसने ये युद्ध अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ

लड़े। धार्मिक/सांप्रदायिक आग में आम लोगों का जालना-पिसना औरंगज़ेब के समय कल्पना के बाहर

की बात होती।

घटनाक्रम की शुरुआत महाल क्षेत्र के शिवाजी पुतला से हुई। और इसमें औरंगज़ेब को घसीटा गया।

औरंगज़ेब की कब्र का एक प्रतीक-पुतला पूर्व नागपुर के लकड्गंज पुलिस के अनुमति के साथ विश्व

 

हिन्दू परिषद और उसकी लठैत वाहिनी बजरंग दल ने इस तिराहे/चौराहे पर लाकर रखा। घटना के

बाद यह सच्चाई सामने आई कि उन्हें जिस थाने से अनुमति मिली थी, यह इलाका उस थाने की

परिधि के बाहर था! खैर, सोमवार 17 मार्च की सुबह के समय कुछ ट्रकों में लद कर दंगाई

मानसिकता में सिर से पाँव तक लिथड़े ये लोग पहुंचे। भड़काऊ नारों के साथ ट्रकों को इस तरह

सड़क पर रोका गया कि सामान्य आवाजाही अवरुद्ध हो गई। सुबह के समय जॉगिंग कर रहे युवकों

ने देखा कि इस नकली कब्र पर असली आयतें लिखी हरे रंग की चादर डाली गई थी, जिसे ये लोग

जलाने की तैयारी कर रहे थे। वहाँ से गुजर रहे एक दो नमाज़ियों ने उनसे हरी चादर हटा कर पुतला

जलाने का आग्रह किया। उनका कहना था कि औरंगजेब का पुतला जलाए जाने पर उन्हें कोई ऐतराज

नहीं है। यहाँ कोई फसाद नहीं हुआ। पर दिनभर तनाव बढ़ाने का पूरा मौका बलवाइयों को मिला।

आधी रात के लगभग महाल से तीन किलोमीटर दूर अच्छी ख़ासी मुस्लिम आबादी वाले हंसापुरी

इलाके में पथराव हुआ। जवाबी पथराव भी शुरू हुआ। कुछ बुलडोज़र, और दूसरे वाहन भी आग के

हवाले किए गए। सुबह से रात तक अफवाहों का बाज़ार भी गरम रहा। दोनों तरफ से पथराव और

आगजनी होती रही। पुलिस देर से सक्रिय हुई। अधिकांश पुलिसवालों के पास पथराव से बचने का

कोई साधन, बेंत के ढाल और इस्पात के हेलमेट आदि नहीं थे। दोपहिया वाहनों के लिए अनिवार्य

फाइबर के हेलमेट पहनकर वे अपना बचाव करते देखे गए। कुल मिलकर पुलिस की और खुफिया

विभाग की तैयारी में भारी कमी नज़र आ रही थी।

अब ज़रा घटनाओं की पृष्ठभूमि की पड़ताल करते हैं।

14 फरवरी को छावा नमक हिन्दी फिल्म रिलीज़ हुई। करीब पैंतीस साल पहले इसी नाम से लेखक

शिवाजी सावंत का उपन्यास आया था। लेकिन यह उपन्यास उच्च/सवर्ण मध्यम वर्ग तक ही सीमित

रही। अब इतने साल बाद इस काल्पनिक/ऐतिहासिक उपन्यास पर हिन्दी सिनेमा का निर्माण टुच्ची,

संकीर्ण-दक्षिणपंथी राजनीति के तहत ही हुआ जैसे पिछले दशक भर में दर्जनों अधकचरी फिल्मे बनीं।

इसी के साथ मध्यप्रदेश के किसी शहर में फिल्म देख कर उत्तेजित शख्स द्वारा स्क्रीन (पर्दा) फाड़ने

की घटना की रिपोर्ट आई थी। दर असल 22 जनवरी को फिल्म की ट्रेलर रिलीज़ होने के बाद से ही

तनाव का माहौल बनाया जा रहा था, कुछ दक्षिणपंथी लोगों ने भड़काऊ बयान दे कर आग में घी

डालने का काम किया। इन में प्रमुख रूप से महाराष्ट्र के बन्दरगाह मंत्री नितेश राणे के बयान को

देखा जा सकता है। भाजपा का यह मंत्री ऐसे भड़काऊ बयानों के लिए कुख्यात है। मुख्यमंत्री ने भी

अपने और संवैधानिक पद की गरिमा को तिलांजलि देकर “महाराष्ट्र की धरती पर औरंगजेब की कब्र

क्यों? मैं औरंगजेब की कब्र को हटाने के पक्ष में हूँ” जैसे कथित बयान दिये। हिंसा और पुलिस द्वारा

लगाई गई कुरफ़्यू से मध्य और पूर्वी नागपुर की जनाता त्रस्त रही।

इस शहर में राष्ट्रघाती स्वयंस्वार्थी संघ RSS का मुख्यालय पिछले सौ साल से होने के बवाजूद

नागपुर का इतिहास पिछली सदियों में सांप्रदायिक सद्भाव और धार्मिक सहिष्णुता का ही रहा है।

नागपुर शहर को एक ऐसे गोंड राजा बख़्त बुलंद शाह ने बसाया था जिसने औरंगजेब के अधीन

सामंत राजा का दर्जा पाने के लिए इस्लाम तो कबूल किया था। लेकिन अपनी गरिमा बनाए रखते

 

हुए उसने “रोटी का रिश्ता, बेटी का नहीं” की भूमिका ली। तभी से सूफ़ी संतों के दरगाह गोंड

आदिवासियों, हिन्दू और मुस्लिम धर्मावलम्बी जनता, सभी के लिए आध्यात्मिक खुराक और मिलेजुले

जलसों-मेलों का केंद्र रहते आए हैं। RSS की विभाजनकारी और भेदभावकारी सामाजिक दृष्टि भी इस

माहौल को बादल पाने में विफल रही।

फिल्मों, राजनेताओं और दीगर स्वार्थों के कुचक्र से देश में सांप्रदायिक घृणा का जो माहौल पिछ्ले

कुछ दशकों से बनाया गया है, नागपुर में फैली हिंसा उसी का परिणाम है।

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BOX 1

प्रशासनिक ढिलाइ और लीपापोती

हिंसा फैलने के बाद माइनॉरिटि डेमोक्रटिक पार्टी के नेता फहीम खान सहित 50 से ज्यादा, मुख्यतः

मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया। यह पार्टी मुसलमानों में कट्टरता के खिलाफ नज़रिया रखने

के लिए जानी जाती है। अगले दो तीन दिनों में अपनी मुस्तैदी की कमी और घृणा फैला रहे VHP/

बजरंग दल जैसे गिरोह मानसिकता वालों को एक तरफ खुली मनमानी करने पर आँखें मूँदे रहने

वाली पुलिस ने बड़ी तत्परता से अगले दो दिनों में और सौ से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया,

जिनमें ज़्यादातर अलपसंख्य थे। बवाल के तीसरे दिन आठ नामजद बजरङ्ग दलियों ने आत्मसमर्पण

किया। उन्हें तुरंत जमानत भी मिलगई। कुल 1200 लोगों के खिलाफ 13 FIR दर्ज किए गए।

 

BOX 2

औरंगजेब की खुली और कच्ची कब्र : गड़े मुर्दे

औरंगजेब एक क्रूर और कट्टर शासक था। वह सामंती दौर का शासक था। उस दौर में क्रूरता

और कट्टरता वीरों के आभूषण समझे जाते थे। पिता को कैद किया, भाइयों की हत्या

कारवाई। सच है। पर यह भी उस युग में सामान्य बात थी। विजयनगर के कृष्णदेव राय ने

भी अपने बड़े भाई की आंखे फोड़वाकर उसे कैद कर गद्दी हासिल की थी। युद्ध बंदियों को

मार डालना, यतनाएँ देना आम बात थी। बंदी प्रतिद्वंद्वी राजाओं को यातना देना और

उनको ज़िंदा दीवार में चिनवाना, सूली चढ़वाना,हाथियों से कुचलवाना, चिरवाना, सर कलम

करना, खाल उधेड़ना….! मनु स्मृति काल से ये सब ‘सजाएँ’ उस अंधकार युग में आम बात

थी। अंग्रेजों ने भी 1857 में स्वतन्त्रता सेनानियों को सारे आम फांसी दी और कई दिनों तक

 

उनकी लाशों को सार्वजनिक स्थलों पर लटकाये रखा! अपनी प्रजा के खेतों को आग के हवाले

करना राणा प्रताप की युद्ध नीति रही है। और भी पहले, ‘महान’ असोक ने अपने भाइयों की

कत्ल कर गद्दी हासिल की थी। लेकिन आधे घंटे तक औरंगजेब की क्रूरता पर्दे पर दिखने

का क्या प्रयोजन है, आज के आधुनिक युग में?

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By editor

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